लहरों की पुकार
लहरों की पुकार सुन इसके एक इशारे पर खींची चली आती हूँ आज भी इसकी ओर बैठ कभी घड़ी दो घड़ी लहरों की गिनती में खो जाती हूँ यादों के…
लहरों की पुकार सुन इसके एक इशारे पर खींची चली आती हूँ आज भी इसकी ओर बैठ कभी घड़ी दो घड़ी लहरों की गिनती में खो जाती हूँ यादों के…
कलाकार हूँ मैं कल को निखार दूंगी यह वादा है मेरा अपने कलम की रफ़्तार से कल को सँवार दूंगी कहानीकार नहीं कहानी हूँ मैं दिल में उठते अनगिनत…
चले ले चलूँ तुझे जंगल की एक सैर कराने वन में बसे जीव-जंतु से मिलाने कहीं शेर की दहाड़ कहीं नागराज की पुकार कहीं भेड़िए की चीख तो कहीं हाथी…
अकेला है तो क्या हुआ इंतजार किसका है एतबार किसका है तन्हाई की महफ़िल में खुद को गले लगाए जा हाथ पकड़ अपने साएँ का आगे कदम बढ़ाए जा क्यों…
दुश्मनों की ताक में पुरातनकाल से जाग रही है इसकी आँखें देश की सुरक्षा में कोई विपदा ना आए इसीलिए हो खड़ा पहरेदार सा हर वादा कर रहा है अदा…
गमों के बाज़ार में बड़ी नादान सी प्यारी सी छुपकर बैठी थी एक खुशी मेरे करीब आने की आहट सुन मचल उठी वो खुशी गले से लगाया तो छलक उठी…
दूसरों को तकलीफ़ देकर खुश होते हैं चंद लोग गम में देख औरों को फूलों सा खिल उठते हैं कुछ लोग पता नहीं किसी दूजे को सताकर क्या हासिल होता…
अपनी ही धुन में मग्न बंजारों के संग बनकर बहती हवा सा दिल चाहता है नदी के जल सा बहता ही जाऊँ मैं कभी दिल कहता है जा सागर से…
दोस्तों के साथ कब बीता वो सुनहरा बचपन कुछ पता ही ना चला कब दिन निकला कब सांझ ढला कुछ पता ही ना चला हम तो बातों के सैलाब में डूबे…
है देखो घनघोर अँधियारा है छाया मासूम सा दिल है फिर घबराया अमावस का लगता है ये सायां पर डर ना तू इस काली रात से है ये भोर से…